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गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज की मोर्चरी व्यवस्था पर सवाल



पांच साल से खराब पड़ा डीप फ्रीजर, सड़ने लगीं लावारिस लाशें


बीआरडी मेडिकल कॉलेज की मोर्चरी व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। यहां शवों को सुरक्षित रखने के लिए लगाया गया डीप फ्रीजर पिछले करीब पांच वर्षों से खराब पड़ा है। इसके चलते खासकर लावारिस और अज्ञात शवों को सुरक्षित रखने में गंभीर दिक्कतें सामने आ रही हैं। गर्मी बढ़ने के साथ शवों के जल्दी सड़ने की घटनाएं बढ़ गई हैं, जिससे न केवल दुर्गंध फैलने का खतरा बना रहता है बल्कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट की शुद्धता पर भी असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

सूत्रों के मुताबिक, मेडिकल कॉलेज की मोर्चरी में रोजाना कई शव पोस्टमार्टम के लिए लाए जाते हैं। नियमों के अनुसार अज्ञात शवों को पहचान और कानूनी प्रक्रिया पूरी होने तक सुरक्षित तापमान में रखा जाना चाहिए, लेकिन फ्रीजर खराब होने के कारण शव सामान्य तापमान में पड़े रहते हैं। गर्म मौसम में यह स्थिति और गंभीर हो जाती है। कई बार शवों में तेजी से सड़न शुरू हो जाती है, जिससे पहचान और मौत के कारणों की सही जांच करना मुश्किल हो जाता है।

मोर्चरी भवन की हालत भी बेहद खराब बताई जा रही है। जगह-जगह सीलन, टूट-फूट और गंदगी का माहौल बना हुआ है। इतना ही नहीं, चूहे और अन्य जीव भी शवों को नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे स्थिति और भयावह हो जाती है। कर्मचारियों का कहना है कि कई बार इस समस्या की जानकारी अधिकारियों को दी गई, लेकिन अब तक स्थायी समाधान नहीं निकाला जा सका।

मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई है कि पोस्टमार्टम हाउस में जांच के इंतजार में हजारों विसरा सैंपल भी खराब हो चुके हैं। जानकारी के अनुसार 43 हजार से अधिक विसरा सैंपल लंबे समय से सुरक्षित संरक्षण के अभाव में खराब हो गए। फॉरेंसिक जांच में देरी के कारण यह संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। इससे कई मामलों की जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होने की आशंका है।

फॉरेंसिक विशेषज्ञों का कहना है कि शवों को नियंत्रित तापमान में रखना बेहद जरूरी होता है। सामान्य तौर पर शवों को चार डिग्री सेल्सियस के आसपास रखा जाता है ताकि शरीर में सड़न की प्रक्रिया धीमी रहे। लेकिन पर्याप्त शीत व्यवस्था न होने पर शव तेजी से डीकंपोज होने लगते हैं। इससे त्वचा, आंतरिक अंग और चोटों के निशान प्रभावित हो सकते हैं, जिससे मौत की असली वजह पता लगाने में कठिनाई आती है।

इस मामले पर मेडिकल कॉलेज प्रशासन का कहना है कि खराब डीप फ्रीजर को जल्द ठीक कराने की प्रक्रिया चल रही है। अधिकारियों के अनुसार जरूरत पड़ने पर नया फ्रीजर भी लगाया जाएगा। हालांकि स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि इतने लंबे समय तक समस्या का समाधान न होना स्वास्थ्य व्यवस्था की गंभीर लापरवाही को दर्शाता है।

अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर पांच वर्षों से खराब पड़े डीप फ्रीजर को बदलने या ठीक कराने के लिए ठोस कदम क्यों नहीं उठाए गए। क्या लावारिस शवों और फॉरेंसिक जांच जैसे संवेदनशील मामलों को इसी तरह नजरअंदाज किया जाता रहेगा, या फिर जिम्मेदार विभाग इस समस्या का स्थायी समाधान निकालेंगे।

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